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ममता बनर्जी का ‘मिशन दिल्ली’ : 2024 में ‘मोदी vs दीदी’ से पहले टीएमसी के लिए ‘सोनिया vs ममता’ क्यों है जरूरी, समझें


नई दिल्ली
जिस राज्य में पार्टी का वजूद तक नहीं था। जहां पिछले चुनाव में पार्टी ने एक उम्मीदवार तक नहीं उतारा था। वहां रातों-रात वह मुख्य विपक्षी पार्टी बन जाती है। हम बात कर रहे हैं ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी की और राज्य है मेघालय। बुधवार को मेघालय में कांग्रेस के 17 विधायकों में से 11 ने तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया, जिनमें पूर्व मुख्यमंत्री मुकुल संगमा भी हैं। यह किसी पार्टी में किसी दूसरी पार्टी की सिर्फ एक बड़ी सेंधमारी नहीं है, बल्कि इस बात की भी मुनादी है कि ममता बनर्जी अब बंगाल से बाहर बीजेपी को टक्कर देने के लिए तैयार हैं।

कई मौकों पर अपने जुझारूपन का लोहा मनवा चुकीं दीदी की नजर अब प्रधानमंत्री की कुर्सी पर है। लक्ष्य दीर्घकालिक है और पार्टी का आक्रामक विस्तार वक्त की मांग है। ममता की यह आक्रामकता भविष्य में नरेंद्र मोदी और बीजेपी के लिए खतरे की आहट है लेकिन अभी इससे सबसे ज्यादा किसी की चिंता बढ़ी है तो वह हैं सोनिया गांधी और कांग्रेस। कांग्रेस खेमे में खलबली सी मची है। फिलहाल यह ‘सोनिया गांधी बनाम ममता बनर्जी’ के बीच शीतयुद्ध का रूप ले चुका है। आइए इस शीतयुद्ध के बहाने ममता के ‘मिशन दिल्ली’ को समझने की कोशिश करते हैं। साथ में यह भी कि 2024 को ‘मोदी vs ममता’ में तब्दील करने का टीएमसी का रास्ता क्यों पहले ‘सोनिया बनाम ममता’ से होकर जाता है।

‘सोनिया बनाम ममता’ शीत युद्ध की शुरुआत
संसद के शीतकालीन सत्र से पहले ममता बनर्जी दिल्ली के दो दिवसीय दौरे पर आईं। संसद में मोदी सरकार को घेरने की रणनीति के तहत विपक्ष को एकजुट करने के लिए ममता बनर्जी पहले भी सत्र से ठीक पहले दिल्ली में आती रही हैं। लेकिन इस बार उन्होंने कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी से मुलाकात नहीं की। नरेंद्र मोदी के केंद्र की सत्ता में आने के बाद जब भी दीदी दिल्ली में आई हैं तो सोनिया गांधी से मुलाकात उनके शेड्यूल का एक तरह से अनिवार्य हिस्सा होता था। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। और तो और, जब इस बारे में दीदी से पूछा गया तो जबाव में सवाल दाग दिया- क्यों मिलना चाहिए? हमें हर बार सोनिया से मिलना क्यों जरूरी है? संविधान में यह तो नहीं लिखा है।

हमें हर बार सोनिया गांधी से क्यों मिलना चाहिए? यह संवैधानिक तौर पर अनिवार्य तो नहीं है।

ममता बनर्जी, मुख्यमंत्री, पश्चिम बंगाल

सोनिया गांधी से ममता बनर्जी के रिश्ते अच्छे रहे हैं। लेकिन ममता बनर्जी ‘मिशन दिल्ली’ की राह में निजी रिश्तों को आड़े नहीं आने दे सकती। निजी रिश्ते अपनी जगह, राजनीति अपनी जगह। मुलाकात लायक माहौल भी तो होना चाहिए। जिस तरह टीएमसी कांग्रेस के भीतर तोड़फोड़ में जुटी है, वैसे वक्त में सोनिया-ममता मुलाकात के लिए माहौल तो कतई नहीं है। सोनिया से कन्नी काटने वाली ममता ने दिल्ली में खुद बताया कि वह जल्द ही मुंबई जाएंगी। एनसीपी चीफ शरद पवार और शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे से मिलने। संदेश साफ है। ममता अब विपक्षी एकता की धुरी बनना चाहती हैं, नरेंद्र मोदी के मुकाबिल विपक्ष का चेहरा बनना चाहती हैं।

कमजोर होती कांग्रेस ममता के लिए मौका
एक कहावत है। जंग और प्यार में सब जायज है। बदलते वक्त के साथ इस कहावत में भी बदलाव आ चुका है। इसमें राजनीति भी जुड़ गई है यानी जंग, मोहब्बत और सियासत में सब जायज है। ममता बनर्जी ‘मिशन दिल्ली’ पर हैं। मुकाबला नरेंद्र मोदी से है, बीजेपी से है। ताकतवर से लोहा लेने के लिए खुद की ताकत बढ़ानी ही पड़ती है। टीएमसी का राष्ट्रीय स्तर पर आक्रामक विस्तार यही तो है। पहले जब कोई राज्य कमजोर पड़ता था तो ताकतवर राजा उस पर धावा बोल देता था। कब्जा कर लेता था। तब जरिया युद्ध बनता था और अब लोकतंत्र में राजनीतिक दांव-पेच जरिया बनते हैं। वैसे भी राजनीति में सब जायज कहा जाने लगा है। टीएमसी वही कर रही है। कांग्रेस कमजोर दिख रही। सोनिया गांधी बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य की वजह से सियासी तौर पर एक तरह से निष्क्रिय हो चुकी हैं।

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राहुल में लड़ने का माद्दा लेकिन पार्टी पर पकड़ हुई कमजोर
राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा अपनी तरफ से पूरी ताकत झोंके हुए हैं। हालांकि, प्रियंका खुद को यूपी तक ही सीमित रखी हैं। बात अगर मोदी सरकार से लोहा लेने की हो तो फिलहाल विपक्ष में राहुल गांधी से बड़ा कोई चेहरा नहीं है। उन्होंने इसे साबित भी किया है। हर बार उन्होंने फ्रंट पर रहकर मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला है। संसद के भीतर भी, सदन के बाहर भी। कुछ मौकों पर सरकार को झुकाया भी है। भूमि अधिग्रहण और कृषि कानून के मसले पर मोदी सरकार को यू-टर्न लेना पड़ा। इन दोनों ही मुद्दों पर अगर कोई पार्टी या नेता सबसे ज्यादा हमलावर था तो वह बिना शक राहुल गांधी ही थे। यूपी में चुनाव से पहले तो हर पार्टी अपनी ताकत झोंकेगी लेकिन सड़क पर उतरकर योगी सरकार को घेरने में प्रियंका-राहुल ही सबसे आगे रहे। देश के सबसे बड़े सूबे में पार्टी भले ही वजूद की लड़ाई लड़ रही हो लेकिन लड़ने का माद्दा तो मुख्य विपक्षी का दिखाया है।

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बीजेपी हर बार दिखाने की कोशिश करती है कि वह राहुल को चुनौती ही नहीं मानती, उन्हें गंभीरता से नहीं लेती। लेकिन देश ने यह भी देखा है कि कांग्रेस नेता के हमलों के ठीक बाद काउंटर के लिए किस तरह केंद्रीय मंत्रियों की फौज उतरती है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि राहुल गांधी की खुद की पार्टी पर पकड़ कमजोर हुई है। वजह शायद सोनिया गांधी का सक्रिय न रह पाना हो या लंबे वक्त से सत्ता से दूरी या भी कोई और…। पार्टी के भीतर रह-रहकर बागी सुर उठ रहे हैं। अपने साथ छोड़ रहे हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया और जितिन प्रसाद जैसे कई भरोसेमंद नेता बीजेपी में चले गए। असंतुष्टों का G-23 समूह है। राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद, हिंदुत्व जैसे राष्ट्रीय मुद्दों पर कांग्रेस के भीतर सीनियर नेताओं का अपनी ढपली-अपना राग है। राहुल-प्रियंका की लाख कोशिशों के बाद कांग्रेस थकी-थकी सी दिख रही है। बिखरी हुई सी दिख रही है और उसी की जगह लेने के लिए ममता बनर्जी छटपटा रही हैं। कांग्रेस में तोड़फोड़ कर रही हैं।

ममता बनर्जी इकलौती नेता हैं जो लोगों के लिए सड़क पर लड़ रही हैं। वह एकमात्र नेता हैं जो नरेंद्र मोदी सरकार और बीजेपी को चुनौती दे सकती हैं।

लुइजिन्हो फलेरियो, गोवा के पूर्व सीएम

राष्ट्रीय स्तर पर खुद को बीजेपी का विकल्प दिखाने की कोशिश
कमजोर होती कांग्रेस को ममता बनर्जी अपने ‘मिशन दिल्ली’ के लिए बहुत बड़े मौके के तौर पर देख रही हैं और वह दोनों हाथ से इस मौके को लपकना चाहती हैं। ‘नरेंद्र मोदी को कई टक्कर दे सकता है तो वह ममता बनर्जी ही हैं’ इस नैरेटिव को सेट करने की कवायद बीजेपी के कद्दावर नेता रहे यशवंत सिन्हा को पार्टी में शामिल करने के साथ हुई। घर को और मजबूत करने के लिए मुकुल रॉय सरीखे उन नेताओं की घर-वापसी करा रही हैं जो टीएमसी छोड़ बीजेपी में शामिल हुए थे। राष्ट्रीय स्तर पर टीएमसी के विस्तार के लिए कांग्रेस सबसे आसान निशाना बन रही है। पूर्वोत्तर में पैठ बढ़ाने के लिए कांग्रेस की तेजतर्रार पूर्व सांसद सुष्मिता देव को पार्टी में शामिल किया। गोवा में कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे पूर्व मुख्यमंत्री लुइजिन्हों फलेरियो को तोड़ा। दोनों को राज्यसभा भेजा। पूर्व राष्ट्रपति दिवंगत प्रणब मुखर्जी के बेटे अभिजीत मुखर्जी भी कांग्रेस छोड़ टीएमसी में शामिल हो चुके हैं। यूपी में कांग्रेस के कद्दावर नेता और मुख्यमंत्री रहे कमला पति त्रिपाठी के पोते ललितेश त्रिपाठी का ठिकाना भी टीएमसी बनी है। बीजेपी से कांग्रेस में गए पूर्व क्रिकेटर और पूर्व सांसद कीर्ति आजाद, जेडीयू नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद पवन वर्मा, हरियाणा कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके अशोक तंवर भी पार्टी की सदस्यता ले चुके हैं।

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ममता की आक्रामक विस्तार नीति का असर भी दिखने लगा है। मेघालय में कांग्रेस के दिग्गज और पूर्व सीएम मुकुल संगमा समेत 11 विधायक टीएमसी का दामन थाम चुके हैं। टीएमसी अब बीजेपी और कांग्रेस के बागियों के ठिकाने के तौर पर उभर रही है। डोरे तो बीजेपी के फायरब्रैंड नेता राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यन स्वामी पर भी डाले जा रहे हैं। वहीं कांग्रेस अगर समय रहते अपना घर दुरुस्त नहीं कर पाई तो G-23 के असंतुष्ट नेताओं का ठौर भी टीएमसी बनेगी, इसमें हैरानी जैसी कोई बात नहीं होगी। दूसरी पार्टियों में तोड़फोड़ से लाए गए नेताओं की असली उपयोगिता तो चुनावों में तय होगी लेकिन टीएमसी को फिलहाल इतना फायदा जरूर हुआ है कि राष्ट्रीय स्तर पर टीएमसी को बीजेपी के एक संभावित विकल्प के तौर पर देखा जाने लगा है। कम से कम तमाम पार्टियों के बागियों की नजर में तो ऐसा ही है।

2024 में मोदी बनाम ममता?
इस साल हुए बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान ही ममता बनर्जी ने ऐलान किया था कि 2024 में वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके संसदीय क्षेत्र वाराणसी में टक्कर देगी। टीएमसी का आक्रामक विस्तार 2024 के चुनाव को मोदी बनाम ममता बनाने की ही कवायद का हिस्सा है। दीदी की छवि स्ट्रीट फाइटर की रही है। उनकी डिक्शनरी में नामुमकिन जैसा कोई शब्द नहीं है। वह अपना किला बचाने के लिए टूटे टांग के साथ व्हील चेयर पर बैठकर भी चुनाव-प्रचार की बागडोर संभाल सकती हैं तो लेफ्ट का किला ढहाने के लिए नंदीग्राम और सिंगूर को ‘कुरुक्षेत्र’ बना सकती हैं।

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लेफ्ट के दिग्गज नेता रहे सोमनाथ चटर्जी को 1984 में कांग्रेस के टिकट पर जादवपुर लोकसभा सीट से शिकस्त देकर पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आईं ममता बनर्जी का शगल ही मुश्किल लक्ष्य बनाना और हर हाल में उसे हासिल करने की रही है। 1998 में मतभेद के बाद उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस की नींव रखी। महज 13 साल बाद ही 2011 में उन्होंने लेफ्ट पार्टियों के अभेद्य दुर्ग पश्चिम बंगाल को ध्वस्त कर दिया। 34 साल से बंगाल की सत्ता में रहे लेफ्ट को उखाड़ फेंक वह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुईं। अब एक बार फिर ममता ने मुश्किल लक्ष्य तय किया है। तब निशाने पर लेफ्ट था। आज निशाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी हैं। हर हाल में लक्ष्य हासिल करने का जज्बा रखने वाली ममता कोई कसर नहीं छोड़ने वाली। साम-दाम-दंड-भेद कैसे भी करके वह ‘मिशन दिल्ली’ की राह में आगे बढ़ रही हैं। 2024 में मोदी बनाम ममता के मद्देनजर आने वाले वक्त में सोनिया बनाम ममता का शीतयुद्ध और तेज हो सकता है।



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